शुक्रवार १०/४/२०२६
अपने निकट संबंधियों और प्रियजनों के जीवन का अंत दुखी करता है। अगर भावुक और संवेदनशील स्वभाव हो तो मन लम्बे समय तक आहत रहता है।
सामान्यतौर पर हिन्दू धर्म में महिलाओं का, श्मशान घाट पर जाना मना किया गया था। शायद महिलाओं के कोमल स्वभाव को जानते हुए या घर परिवार की जिम्मेदारियों को सामने देखते हुए, इस तरह की सामाजिक व्यवस्था बनाई गई थी। लेकिन आजकल महिलाएं भी अपने प्रिय जनों को अंतिम विदाई देने जाने लगी हैं। मेरा भी सामना दो बार श्मशान घाट से हुआ। एक बार अपनी मां को अंतिम विदाई देने ,दूसरी बार माँ समान आंटी की मृत देह को विदाई देने के लिए।
पहली बार वाराणसी में गंगा नदी के तट पर हरिश्चन्द्र घाट पर और, दूसरी बार निगमबोध घाट कश्मीरी गेट दिल्ली में यमुना जी के किनारे।
अंदर प्रवेश करते ही स्पष्ट शब्दों में कुछ पंक्तियाँ लिखी हुई दिखाई दीं “मुझे यहाँ तक पहुंचाने वालों तुम्हारा धन्यवाद ,आगे हम अकेले ही चले जायेंगे “
कुछ पलों के लिए आगे बढ़ते हुए कदम ठिठक से गए। एक अलग सी नीरवता मन के भीतर से बाहर तक पसरी हुई महसूस हुई। जीवन का सत्य सामने दिख रहा था। कल तक अपनी भावनाओं अपने मन और दिमाग के भरोसे चलता हुआ शरीर , निष्प्राण सामने भूमि पर फूल मालाओं से ढंका हुआ पत्थर सा पड़ा था।
हाथ में कलम और कागज़ के आते ही मन बोलने लगा। श्मशान की नीरवता और कोलाहल दोनों मिलकर वाचाल से लगने लगे।
वाराणसी शहर कहने को तो हमारा अपना शहर है। बाबा विश्वनाथ की नगरी से हमारा गहरा नाता है लेकिन ,कुछ सालों के लिए हमारा मन इस शहर से उचट सा गया। जब वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर अपनी मां के अंतिम संस्कार को हमने अपनी आंखों के सामने देखा।

जीवन को भरपूर उमंग और उत्साह से जीने वाली अपनी मां के नश्वर शरीर को चंदन की लकड़ी की चिता पर धू धू कर राख होते हुए देखा। अघोरियों की नगरी वाराणसी मानो अट्टहास कर रही थी और कह रही थी – देखो ! जीवन का सत्य अपनी आंखों से देखो ,आज नहीं तो कल ,कल नहीं तो परसों , हर जीवन का सत्य यही है।
सामने ही नदी पर पर्यटन को बढ़ावा देते हुए, नाव पर विदेशियों के साथ स्थानीय गाइड भी दिख रहे थे। जिनके लिए जलती हुई चिता कौतूहल के साथ पर्यटन का एक दृश्य था ,उनके कैमरे क्लिक होते रहे। कैमरे की फ़्लैश लाइट कुछ पल के लिए चमकी , जलती हुई चिता अपने चरम पर थी।
हमारे अविरल बहते हुए आंसू उस समय अचानक से थम गए जब, बगल में ही जलती हुई लावारिस लाश की चिता से लकड़ी चुरा कर ले जाते हुए किशोरवय बच्चों ने , किसी की अंतिम यात्रा में व्यवधान डाला।
किताबों में पढ़ा था श्मशान के भरोसे अपना जीवन यापन करने वाले कुछ लोग चिता से अग्नि लेकर अपना भोजन पकाते हैं। वह सत्य सामने दिख रहा था ,चिता से जलती हुई लकड़ियां निकालकर चूल्हे जलाये जा रहे थे। शाम के धुंधलके में भोजन पकाने की तैयारी हो रही थी।
न जाने कैसे- कैसे भाव मन में तेजी से आ और जा रहे थे। दुःख का भाव तो था ही कुछ समय के लिए वितृष्णा भी थी करुणा भी थी। मृत शरीर फूल मालाओं से ढंके हुए अपनी अंतिम यात्रा को पूरा करने के लिए एक कतार में लेटे हुए थे। क्योंकि पूरे भारत वर्ष से लोग मोक्ष की आशा में काशी तक का सफर पूरा करते हैं।
अघोरियों की रक्त के समान लाल ऑंखें उलझे हुए बाल और मंद-मंद मुस्कान ,उनकी एक अलग ही दुनिया की बात कह रही थीं।
श्मशान भूमि से बाहर आने से पहले गंगा जी के जल को अपने सिर पर छिड़ककर आगे बढ़ते ही, मन कहने लगा जन्मदायनी अपनी अंतिम यात्रा पर चली गयीं। अब मेरे मन की बातों को सुनने के लिए कौन है ?प्रश्नवाचक चिन्ह गोल – गोल मेरी आँखों के सामने घूम रहा था ,कभी टेढ़ा कभी उल्टा कभी सीधा। मन से मौन वार्तालाप चल रहा था।
गंगा मैय्या जाने कितनों के पाप -पुण्य का बोझ उठाकर अविरल बहती रहती हैं। बाहर निकलते हुए महादेव जी की मंद – मंद मुस्कान वाली मूर्ति मानो कह रही हो। जब कभी भी अभिमान के वश में होना तो यहाँ के पल याद करते रहना। इंसान जीवन के सत्य को भूलकर बैठा रहता है इसीलिए तमाम छछंदों में उलझा रहता है।
दिल्ली शहर की निवासी होने के कारण निगमबोध घाट पर जाना हुआ। जैसा भागता हुआ शहर है वैसी ही शमशान भूमि की झांकियां हैं। ट्रैफिक जाम में फंस कर पहुंचते हुए लोग हैं। लोगों के पास समय की कमी है। भावनाओं में बहने ,ज्यादा सोचने और आडम्बरों में पड़ने का समय नहीं है। मशीन सा जीवन ,मशीन सी मृत्यु और दौड़ता भागता हुआ इंसान।