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कथा महाशिवरात्रि की

by 2974shikhat February 25, 2025
by 2974shikhat February 25, 2025

भारतभूमि पौराणिक कथाओं की भूमि है यहाँ पर लोककथाएं भी हैं ,लोकपरम्परा भी हैं ,व्रत ,पर्व और त्यौहार भी हैं।
महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को किया जाता है ,इस समय वसंत अपनी पूर्णता पर होता है।

पौराणिक कथा के अनुसार –

सती का जन्म और तप

भगवती सती ने अपना दूसरा जन्म पर्वतराज हिमवान के यहाँ लिया। देवर्षि नारद के उपदेश से उन्होंने शंकर जी को पाने के लिए कठोर तप किया। उमा सूखे बेलपत्र को भी छोड़कर अपर्णा हो गयीं। देवताओं को आवश्यकता थी की भगवान शिव का परिणय हो। तारकासुर नामक असुर ने देवताओं से स्वर्ग छीन लिया था।

तारकासुर का वर और समाधि में शिव

तारकासुर ने ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि ,केवल शंकर जी के औरस पुत्र ही उसका वध कर सकते हैं। भगवान शिव का विवाह हो तब तो पुत्र हो। शिव पुराण की कथा के अनुसार- सती ने अपने पिता दक्ष के हवन कुंड में जब अपनी देह त्याग दी ,दुःख और क्रोध से व्याकुल होने के बाद, भगवान शिव वैराग्य भाव से समाधि में स्थित हो गए।


वसंत का प्रकट होना और कामदेव का भस्म होना


देवताओं ने भगवान शिव की समाधि को भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। प्रकृति अपने उल्लास में झूमने गाने लगी। पुष्प लताएं खिली खिली थीं ,पक्षियों की कलरव और कूक चारों तरफ दिख रही थी,वसंत प्रकट हुआ था। उसी समय पार्वती
जी वहां पहुंची। कामदेव के बाणों के कारण शिव जी का ध्यान टूटा और समाधि भंग हो गयी। शिवजी के तीसरे नेत्र ने कामदेव को भस्म कर दिया। तभी से काम अनंग हो गया।


शिव -पार्वती विवाह और तारकासुर का वध


पार्वती जी की तपस्या काम के भस्म हो जाने पर भी सफल हुई। भगवान शिव के साथ पार्वती जी का विवाह हुआ। भगवान के औरस पुत्र कार्तिकेय ने असुर तारक को संग्राम में मार गिराया। भगवती पार्वती से संतुष्ट होकर शंकर जी ने उन्हें अपने आधे शरीर में ही स्थान दिया और अर्धनारीश्वर हो गये।


समुद्र मंथन और नीलकंठ रूप


यह भी कहा जाता है की ,समुद्र मंथन हो रहा था ,सबसे पहले विष प्रकट हुआ। विष का हानिकारक प्रभाव सभी जीवों और देवताओं के ऊपर पड़ने लगा। सभी विष की ज्वाला में जलने लगे। देवताओं ने महादेव से प्रार्थना की। आशुतोष द्रवित हो गये ,भोला भंडारी जो ठहरे। विश्व कल्याण की बात सामने आयी। महादेव ने विष को बायें हाथ पर उठाया और पी लिया। विष को कंठ में ही रोक लिया ,अतः कंठ नीला हो गया।
समुद्र मंथन से ही निकले चन्द्रमा को मस्तक का आभूषण बना लिया।


शिवरात्रि पर जलाभिषेक


भगवान शिव के नीलकंठ रूप के कारण ही शिवरात्रि पर जल चढ़ा कर, महादेव जी को शीतलता प्रदान की जाती है। शिवरात्रि पर हम महादेव जी के विभिन्न रूप की आराधना करते हैं।
भारत भूमि के अलग -अलग हिस्सों में , विभिन्न प्रकार की लोक मान्यताएं शिवरात्रि को लेकर प्रचलित हैं। निश्चित तौर पर धूनी रमाने वाले औघड़ शिव से ,आदिशक्ति के विवाह की कल्पना ही अद्भुत थी।
महादेव के अनंत नाम हैं ,अनंत चरित्र हैं। वे महाज्वालाकार प्रलयंकर हैं ,महाकाल हैं।
शिवरात्रि सृष्टि के आरम्भ का पर्व है।

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मेरे विचार, और कल्पनाएं… जीवन की छोटी-छोटी बातें या चीजें, जिनमे सामान्यतौर पर कुछ तो लिखने के लिये छुपा रहता है… एक लेखक की नज़र से देखो तब नज़र आता है … उस समय हमारी कलम बोलती है… कोरे कागज पर सरपट दौड़ती है.. कभी प्रकृति, कभी सकारात्मकता, कभी प्रार्थना तो कभी यात्रा… कहीं बातें करते हुये रसोई के सामान, कहीं सुदूर स्थित दर्शनीय स्थान…

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