आजकल घर थोड़ा खाली है। सामान की अधिकता है लेकिन, व्यक्तियों की कमी है इसलिए घर थोड़ा खाली है। मन भरा हुआ है लेकिन घर खाली है। कहते हैं खुद को व्यस्त रखना, घर के खालीपन को दूर करता है लेकिन ,बच्चों काअपनी उच्च शिक्षा के लिए घर से पलायन घर को खाली कर देता है।
चिड़ियों की चहचहाहट है ,बादलों के द्वारा बारिश भी है ,आकाश में नीलापन भी है,त्योहारों के आने की आहट भी है लेकिन, घर थोड़ा खाली है। मुझे इंतजार रहता है अपनी बेटियों के हॉस्टल से आने का, उनके साथ समय बिताने का। बच्चों के बड़े हो जाने के बाद भी उनके बचपन को याद करके उनके साथ तुतलाते हुये बातचीत करने का।
फिर ,थोड़ी देर के लिए ही सही वो सिमट जाती हैं मेरी गोद में ,खुद को छोटा बच्चा समझ लेती हैं। कुछ पलों के लिए मैं फिर से अपने सुनहरे दिनों में पहुंच जाती हूं। जब काम बहुत होता था ,समेटना पहाड़ सा लगता था। पता नहीं कब दिन से रात और रात से सुबह हो जाती थी।बच्चों की खिलखिलाहट उनका मचलना, उनका जिद करना और मेरा कभी-कभी गुस्सा करना आज याद आता है।
कहते हैं बच्चे गीली मिट्टी समान होते हैं ,आप उन्हें उनके कोमल स्वरूप में छोड़ नहीं सकते। उन्हें आकार देना पड़ता है खुद को कुम्हार बनना पड़ता है। खुद की इच्छाओं और जरूरतों को समेटते हुए बच्चों के विकास के लिए कमर कसना पड़ता है। सामान्य तौर पर हर मध्यम वर्गीय परिवार की यही कहानी होती है।
घर का खालीपन कभी-कभी व्यथित करता है ऐसा नहीं है कि आप व्यस्त नहीं है। खुद को व्यस्त रखने के तरीके बहुत हैं लेकिन, जीवन में बच्चे जो सबसे महत्वपूर्ण है वो अब हर समय उपलब्ध नहीं है ,बस इसीलिए घर में खालीपन है।
यह कहानी शायद मेरी अकेले की नहीं है। अब मैं शायद ज्यादा व्यवस्थित हूं ,खुद के लिए समय बहुत है। भगवान की कृपा से देश की राजधानी में अपना घर है। चाहो तो घूमने और कुछ नया सीखने की बहुत सारी जगह और चीजें हैं।
जीवन के हर पल को जीवंतता से जीने की आदत से मजबूर हूं।
आजकल की युवा पीढ़ी को भागते हुए देखती हूं। कान में इयर फोन लगाकर संगीत सुनते हुए, काम करते हुए देखती हूं। सोच विचार में पड़ जाती हूं कि ,अपने एक सेंसरी ऑर्गन के साथ क्यों ज्यादती की जा रही है। जरा सा कान से ईयर फोन को बाहर निकालो प्रकृति की सैर पर चलो अपने आसपास वाली चीजों के प्रति थोड़ा सजग रहो।
भावशून्य सा चेहरा ,अपनी ही धुन में थिरकता युवा बेचैन कर देता है। घर वापस आती हूँ ,अपने जरूरी काम खत्म करके जब आरामतलबी से बैठती हूँ ,तब याद आता है मेरी बेटियों ने इयर फ़ोन का ज्यादा उपयोग करना तो नहीं शुरू कर दिया ?
रोज की दिनचर्या की बातचीत के बीच में मेरी सलाह भी उन तक पहुँच जाती है। बच्चों कान में इयरफ़ोन तो ज्यादा देर तक नहीं लगाते हो? ज्यादा देर तक लगाने से सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है और, दूसरी बात आप अपने आस पास से कट जाते हो।
वही चिर परिचित अंदाज में उत्तर मिलता है मां आप परेशान मत होइये। एक बार खुद भी लगाकर देखिये ज्यादा फोकस होकर अपना ब्लॉग लिख पायेंगी। लगता है आप आज दिल्ली मेट्रो की यात्रा कर के आयी हैं, मोबाइल की दुनिया में गुम लोगों को देखकर आयी हैं। मै हल्का सा मुस्कुरा दी । बच्चे, मेरे हर तरह के मनोभावों को समझ लेते हैं। एक बार फिर से आवाज आयी ,वैसे अच्छी कंपनी के इयरफोन नुकसान नहीं पहुंचाते।
मैंने भी कई बार कोशिश की अपने कान में इयरफोन लगाकर म्यूजिक सुनने की , पार्क में सैर करने की ,ऐसा लगा मानो दम घुट रहा हो।
बाहर घूमते समय न पंक्षियों की आवाज सुनाई पड़ती हैं न बच्चों का कोलाहल। जीवन के स्पंदन को भी महसूस नहीं कर सकते।
मेरे विचार से तो जीवन वही है, जहाँ बाहर के कोलाहल के साथ मन शांत और एकाग्र हो। और घर का खालीपन भी आपको कुछ अच्छा लिखने के लिए प्रेरित कर दे।