हर करवट पर, हर दुख और दर्द पर माँ को पुकारने की आदत सी बन गयी है। हम भारतीयों के घरों में अगर माँ आसपास है तो पुकारने पर पल भर में ही सामने आ जाती है। दैवीय जगत की अगर बात करो तो माँ को पुकारने के लिए ,आस्था और भक्ति के साथ पुकारना पड़ता है लेकिन ,फिर भी माँ कहीं भी नजर नहीं आती।
शरद ऋतू और दुर्गा पूजा एक अलग ही उत्साह होता है उत्सव का अहसास होता है।
हर माँ को यह लगता है की नवरात्रि का जो उत्साह उसके भीतर है क्या वह ,यही उत्साह अपने बच्चों के भीतर भी देख पायेगी? माँ दुर्गा की आराधना ,कन्या पूजन ,अपने बच्चों के संस्कारों में शामिल कर पायेगी क्या ?
आजकल युवाओं के भीतर अपनी सभ्यता -संस्कृति ,अपनी विरासत को सहेजने का रुझान तो बढ़ा है लेकिन अपने कम्फर्ट के भीतर ही रहा है।
दुर्गा पूजा का मतलब सिर्फ फ़िल्मी धुनों पर थिरकते हुए गरबा करना ही नहीं है। अखंड ज्योति की शुद्धता को बनाये रखना भी है ,मिटटी के पात्र में भीगे हुए जौ के दानों को अंकुरित होकर बड़े होते हुए देखना भी है,माँ को भोग के रूप में चढ़ने वाला प्रसाद भी है।
आज भी जब दुर्गा सप्तशती के श्लोकों को किसी भी माध्यम से सुनती हूँ तो, खुद को ऊर्जावान महसूस करती हूँ। सोचती हूँ माँ दुर्गा यह आपके स्तवन की ख़ुशी है या क्या है ?
अपने घर की बालकनी से सोसाइटी गेट की तरफ नजर फिर गयी ,बच्चियों की टोली अति उत्साह में सजी संवरी सी नजर आ गयी। सोसाइटी के भीतर रहने वाली कन्यायें अष्टमी नवमी को अति व्यस्त रहती हैं। उन्हें घर में बुलाकर कन्या पूजन करना बहुत मुश्किल काम होता है। इसीलिए गरीब घरों की कन्याओं की टोली नवरात्रि के समय पूजी जाती हैं।
एक अलग ही दर्प से उनका चेहरा दमकता हुआ दिखता है ,कि आज का दिन तो उनका है। आज इन सोसाइटी के घरों के द्वार उनके सम्मान के लिए खुल गए हैं। माँ दुर्गा की पूजा तभी पूरी होगी जब उनके चरण धोये जायेंगें। उस समय कोई उन कन्याओं से उनकी जाति और धर्म नहीं पूछता ,उन्हें माँ का रूप ही माना जाता है।
विचारों के तानेबाने में उलझते हुए रसोईघर की तरफ मुड़ गयी ,देखा रात में भिगोये हुए चनों ने अपना आकर बढ़ा लिया है ,हलवा पूरी बनाने का सामान ,हवन सामग्री ,आम की लकड़ी भी रसोई में नजर आ गयी। मुझे भी अपनी पूजा को पूरा करने के लिए हवन और कन्या पूजन करना था।
कल का दिन तो रावण दहन का होगा ,दशहरे के उत्साह का होगा। रावण दहन देखता हुआ हर व्यक्ति राम और रावण के चरित्र में तुलना तो जरूर करेगा।
सोच रही थी मै हिन्दू घरों में होनेवाली माँ की आराधना ,कहीं न कहीं तो पुरुषों के मन में स्त्रियों के प्रति अपनी सोच को बदलने का दम तो रखती है। दुर्गा पंडाल की हॉपिंग करना ,गरबा नृत्य करना ,स्ट्रीट फ़ूड खाना ,शरद ऋतू की उत्सव वाली वाइब को एन्जॉय करना ही तो एकमात्र उद्देश्य नही रहता होगा।