कुछ दिन पहले की ही तो बात है ,खिड़कियों के शीशे बाहर की सर्द हवा और तुलनात्मक रूप से घर के भीतर की ऊष्मा को ,अपने ऊपर महीन से कुहासे के रूप में दिखा रहे थे। जिसके कारण घर के भीतर से सर्द सुबह धुंधली सी दिख रही थी। शीशे को आहिस्ता से साफ़ करने पर बाहरी दुनिया साफ़-सुथरी और सुन्दर नज़र आती है।
अगर शीशे को न भी साफ़ करो तब भी सूर्य की तपिश से ,कलात्मक तरीके से बूंदे ढलकती हुई नज़र आती हैं। और देखते ही देखते शीशा साफ़ सुथरा और चमकीला दिखता है।
सर्द मौसम में अगर बारिश हुई तो कहीं ‘सोने पर सुहागा ‘तो कहीं ‘कोढ़ में खाज’वाली बात समझ में आती है। विपरीत मौसम में कभी खेती किसानी को फायदा होता है तो कभी नुकसान। आम इंसान की दिनचर्या भी सर्दी की बारिश से प्रभावित दिखती है। मुझे तो सर्द मौसम की सुबह हो या शाम ,दोपहर हो या रात सब मनभावन लगता है।
सच कहो तो आप कहीं न कहीं ,रोज की जरूरतों का काम करने के लिए भी खुद से लड़ते हो,क्योंकि ठंडा मौसम और आलस ऊर्जा को बचा कर खुद को गर्माहट में रखने की बात करता है।
इस समय जरूरत पड़ती है सेल्फ मोटिवेशन की। डिसिप्लिन और सेल्फ मोटिवेशन ही विपरीत को अनुकूल कर के स्वस्थ जीवन शैली की बात कहता है।
बचपन में सर्दियों के मौसम में मुख से निकलने वाली हवा को धुँए सा देखकर, हर बच्चा कुछ समय के लिए आश्चर्य में पड़ जाता था और अभी भी पड़ जाता है।
धीरे-धीरे मुख से हवा को छोड़ना और धुँए का गुबार सा देखना, स्मोकिंग की दुनिया से अलग विज्ञानं की बात कहता है। यहाँ तापमान का परिवर्तन कुहासा लाता है। पानी की छोटी छोटी बूंदें नमी के रूप में, हवा के साथ मिलकर धुआं बनकर चारों तरफ बिखर जाती हैं।
काँच और धुंध ,तापमान में परिवर्तन के कारण हमेशा परेशान करते हैं ,चाहे वो गाड़ी का शीशा हो या नाक के ऊपर चढ़ा हुआ चश्मा बार बार साफ़ करना ही पड़ता है।
ऐसा लगता है की हमारे सामने जानबूझ कर एक पर्दा डाला जा रहा हो ,जो भले ही वातावरण की नमी के कारण बना हो लेकिन ,सामने वाली चीज़ों को धूमिल तो कर ही देता है और विजन स्पष्ट नही रहता।
फिलॉसफी की बात करो तो विजन क्लियर करना हमेशा जरूरी रहता है ,नही तो न तो आप सुरक्षित तरीके से गाड़ी चला सकते हो न तो , चश्मे के जरिये ही बेहतर तरीके से देख सकते हो।
बात सर्दी के मौसम कोहरे और धुंध तक पहुंच कर, मन और आत्मा के ऊपर छाए हुए कुहासे तक भी पहुँचती है। धुंध विहीन मन आत्मा को और मन को शांत करता है। सलीके से साफ़ किया हुआ मन स्पष्ट नजरिये को सामने रखता है। सब कुछ संभव और बेहतर सा नजर आता है। कुहासे की परतें धीरे – धीरे धूमिल हो जाती हैं। हवा में हल्की सी गर्माहट मौसम के बदलने की बात कहती जाती है।
और कुहासा बह गया
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