आह ,ओह,आउच इस तरह की आवाज आना सामान्य बात हो गयी थी ,हमारी सोसाइटी के सामने से गुजरने वाले लोगों के लिए।
हे भगवान ! कब बनेगी यह सड़क ,इस बार कोई राजनीतिक पार्टी वाले वोट मांगने तो आये तब उनके सामने अपना गुस्सा निकालने की पूरी तैयारी थी । इस सड़क के दोनों तरफ कुल मिलाकर आठ सोसाइटी में लोगों का आशियाना है । करोड़ों के फ्लैट में रहने वाले लोगों के लिए इस सड़क की दुर्दशा असहनीय थी ।
हमे हमारे शहर ,हमारे देश में रहने वाले परिचितों ने इस बात की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से दी कि ,अरे ! आपकी सोसाइटी के सामने की सड़क तो रातों रात बन गयी।कुछ लोगों ने तो पूरे अधिकार के साथ मिठाई के साथ -साथ पार्टी की भी मांग रख दी । हमारा भी दिल ख़ुशी के मारे बाग़ बाग़ हो गया ‘और सड़क बन गयी’ की बात पर हमने मिठाई और पार्टी दोनों के लिए हां भर दी ।
दिमाग ने उसी समय इस बात से अवगत कराया की ये वही सड़क है जिसने ,हमारी कार के शॉकर को बीमार कर दिया ।
सबसे बड़ा दुःख सोसाइटी में रहने वाले लोगों के लिए अपने सुसज्जित से फ्लैट से निकलकर इस गड्ढे वाली सड़क पर सफर तय करना होता था ।
सड़क की दुर्गति का यह किस्सा कोई महीने दो महीने या साल दो साल का नही है ,पांच साल से भी पुराना है ।
सड़क के गड्ढे इतने गहरे थे की गर्भवती महिलाओं को ,इस सड़क पर ज्यादा सावधानी से सफर तय करना पड़ता था । नहीं तो समय से पूर्व प्रसव का खतरा बना रहता था । सोसाइटी की मैनेजिंग कमेटी की तरफ से इस सड़क पर सुबह शाम पानी का छिड़काव होना सामान्य बात हो गयी थी ।क्योंकि यहाँ से उड़ने वाली धूल २० से २५ मीटर ऊपर तक अपना प्रभाव छोड़ती थी । एक अलग ही धुंधला सा वातावरण बन जाता था ।
सर्दियों की शुरुआत में दिल्ली सरकार द्वारा लागू ग्रेप के अलग – अलग चरण में से कुछ तो ,इस इलाक़े में बारहों महीने लागू रहने वाली स्तिथि रहती थी । सिर्फ और सिर्फ इसलिए क्योंकि सरकार और सम्बंधित विभाग, अपनी कछुआ वाली चाल चलने में माहिर हैं ।
ऐसा लगता था मनो धूल, यहाँ रहने वाले लोगों ने सांस लेते समय पी लिया होगा। स्किन एलर्जी से लेकर श्वांस संबंधी परेशानियों को गले लगा लिया होगा । गड्ढों के बीच में से सही सलामत सड़क खोजने के क्रम में रिक्शा और कार चालक भी अपनी ज़िग -ज़ैग वाली चाल चलते थे ,जिसके कारण दुर्घटनाओं का होना लाज़मी था । देर से ही सही प्रशासन चेता तो ‘और सड़क बन गयी ‘।
क्या स्थानीय विधायक ,पार्षद और सांसद के घर के सामने की सड़क भी इतने लम्बे समय तक, बदतर हालत में होती होगी ?टूटी फूटी सड़क के किनारे रहने से जो स्वास्थ संबंधी परेशानियां हमने झेली हैं ,उस तरह की परेशानियों को इन जनप्रतिनिधियों ने कभी महसूस किया होगा ?सफ़ेद ,उजला ,धवल कपडा पहनकर घूमता हुआ यह वर्ग ,चुनावी मौसम की आहट बड़ी दूर से सुन लेता है ,फिर अपना घड़ियाली स्वभाव दिखाता है ।
बहुत लम्बा समय बीत गया था इस सड़क को चारकोल की कालिमा के साथ दमकता हुआ देखे हुए ,उस अति प्रिय रोड रोलर को इस सड़क पर धीमी गति से चलते हुए देखे हुए । उसी अंदाज में हमने भी अपनी प्रतिक्रिया दी ,खिड़की की ब्लाइंड्स को थोड़ा ऊपर उठाया नयी चमचमाती हुई सड़क का, सूर्य की प्रथम किरण के साथ दर्शन पाया ।
लेकिन क्या इस सड़क से गुजरने के कारण होने वाली पीड़ा को एक सामान्य व्यक्ति ,जो किसी राजनीतिक पार्टी के पीछे अपना महत्वपूर्ण समय नही बिताता वो इतनी जल्दी भूल पायेगा ? अपने विचारों को राजनीतिक महत्वाकांक्षा के पीछे भागते हुए जनप्रतिनिधियों की चिकनी चुपड़ी बातों से बदल पायेगा?
मेरे विचार से चुनाव आने पर सड़क के दोनों तरफ सोसाइटी में रहने वाले बड़े वोट बैंक के दिमाग में ,उथल – पुथल होना स्वाभाविक है । लोगों की बेसिक जरूरतों को समय रहते नही पूरा किया जायेगा तो, मतदाता पोलिंग बूथ पर भी नकारात्मक विचारों के साथ ही जायेगा ।
खैर ,सड़क बनने की इस प्रक्रिया ने हमसे कुछ लिखवा दिया ,लेकिन दिमाग में यह विचार आना लाज़मी है की क्या जनप्रतिनिधियों के प्रति विरोध की सुगबुगाहट की बात उन तक पहुंच गयी थी ? या अगले साल आने वाले चुनाव की तैयारी का यह पहला कदम है ?
बात कुछ भी हो ,विशेष बात तो यह है कि ‘और सड़क बन गयी’ ।