२१/७/२६
ज़रा सा लंबे समय के बाद घर जाना हुआ। रसोई के पास अलमारी में अचार के खाली मर्तबान नजर आ गए। एक लाइन में शांति से खड़े थे। कुछ चीनी मिट्टी के थे कुछ कांच के लेकिन आज, अनुपयोगी से रसोई में रखे हुए थे। हमने विवाह से पहले कभी अचार नहीं बनाया था। न पहले कभी बनाने की इच्छा ही जागी। हां, मां को या दादी को गर्मी के मौसम में अचार बनाते हुए देखा करती थी। अचार केवल उस वर्ष वाली गर्मी में नहीं पड़ता था जब घर परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती थी ,तब पूरे साल अचार ,बड़ी ,पापड़ बनाना मना होता था।
मै अचार को बनाने की सारी प्रक्रियाओं को ध्यान से देखा करती थी। घर में ज़रा अफरातफरी रहती थी। दादी की आवाज आती थी ,कच्चा आम आ गया अब जल्दी से उसे पानी की बाल्टी मे भिगो दो नहीं तो पक जाएगा। लंबे समय तक चलने वाला अचार बनाने के लिए आम चोटिल नहीं होना चाहिए ,यह कहकर मम्मी बाल्टी में से कटे-फटे आम को अलग कराया करती थी। यह काम छोटे बच्चों से कराया जाता था।

अलग किये हुए घायल आम अलग अलग तरीके से उपयोग में आते थे। हफ्ते दो हफ्ते वाला खट्टा मीठा अचार बनता था , पुदीना और आम की हरी चटनी , आम को उबालकर उसका पना बनता था जिसमें पुदीना भुना जीरा और काला नमक के साथ चीनी मिलायी जाती थी। कच्चे आम का पना गर्म हवा के थपेड़ों से बचा कर पहले भी रखता था ,आज भी रखता है।
अभी भी अगर कटे-फ़टे आम बचे होते थे तो अरहर की दाल कच्चे आम के साथ बनाई जाती थी। इस दाल में ढेर सारा लहसुन अदरक हरी मिर्च जीरे और हींग के साथ तड़का डाला जाता था। गरम-गरम दाल और चावल के साथ किसी और चीज की जरूरत भी महसूस नहीं होती थी। अभी भी अगर आंधी तूफान में गिरे हुए आम बचते थे तो उसकी या तो मसाले वाली सूखी खटाई बनाई जाती थी या ,धूप में सुखाकर अमचूर पाउडर बनाया जाता था।
चीनी मिट्टी या कांच के मर्तबानों को साफ सुथरा करके सूखने के लिए बच्चों की पहुंच से दूर रखा जाता था। कई सालों तक चलने वाले ये मर्तबान गृहस्थी के समान में महत्वपूर्ण होते थे। घर के ही किसी पुरुष या बाहर से किसी को बुलाकर आम को अपने इच्छा अनुसार छोटे या बड़े आकार में कटवाए जाता था ।
बच्चों को वैसे तो अचार बनाने वाली गतिविधि से दूर रखते थे क्योंकि, ऐसा विचार हमेशा से रहा है कि अचार खराब ना हो इसके लिए साफ सफाई बहुत महत्वपूर्ण होती है। कड़क धूप में सूखी हुई सरसों ,सौंफ, जीरा ,अजवाइन ,मंगरैल कुटी हुई लाल मिर्च ,नमक , हल्दी और स्वाद के अनुसार हींग का प्रयोग भी किया जाता था।
सारे मसालों को दरदरा पीस कर अलग अलग तश्तरियों में रख दिया जाता था ,सरसों के तेल के भरे हुए डिब्बे रसोई में दिख जाते थे।
अब अनुभवी हाथ काम करते थे। दो या तीन दिन से हल्दी और नमक में लिपटी हुई आम की फांकों को मसालों में लपेटकर ,उसमे सरसों का तेल मिलाकर मर्तबानों में भरकर छत पर, घूप वाली जगह पर रख दिया जाता था। कुछ दिनों के अंतराल में मर्तबान को हिलाकर अचार के तैयार होने का इंतज़ार किया जाता था।
अभी तक मैं रसोई के पास खड़े होकर खाली मर्तबानो को निहार रही थी। विचारों का क्रम चल रहा था। अचार बनाने की सारी प्रक्रियाएं सामने आ और जा रहीं थी। बार-बार ऐसा लग रहा था अरे ये जार खाली क्यों हैं? इसके भीतर का जीवन कहां है ?
याद आया माँ तो अब इस दुनिया में नहीं है ,अचार बनाने की विधि भी हमारी परंपरा का हिस्सा है। तब सोचा था बनाऊंगी मैं भी अचार ,अपनी मां की तरह। बाजार में तो हर चीज मिलती है। पैसा खर्च करो बना बनाया समान हाजिर। मेरी मां ने अचार बनाने की परंपरा का पालन किया ,मैंने अनुसरण किया। लेकिन आगे क्या उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए विदेश गए बच्चों के जीवन में, इस तरह की परंपराएं महत्व रखेंगी ? बहुत सारी परंपराएं लुप्त हो रही हैं क्या हम उन्हें बचा पाएंगे ?