बचपन की यादें कभी धूमिल नहीं होती हैं।
बचपन में पापा को मिला वो सरकारी बंगला,जिसमे घर के अंदर कमरों की बहुतायत तो नहीं थी ,लेकिन दो भागों में बटा हुआ
लॉन और घर के पीछे बड़ा सा किचन गार्डन ,हर मौसम में खिलखिलाता रहता था।
बगीचे के किनारों पर जामुन ,आम,बेर ,कटहल और अमरुद के पेड़ लगे हुए थे। उन पेड़ों पर अलग अलग तरह के पंक्षियों का बसेरा भी होता था।
हमारा सबसे ज्यादा लगाव पेड़ों को सर उठा कर देखने में रहता था। घर के सामने की तरफ लगे शीशम और सेमल के पेड़ अपनी ऊंचाई के कारण अभिमानी से नजर आते थे। ऐसा लगता था छोटी सी लड़की को निर्भीकता से अपनी तरफ देखते देख, मंद मंद मुस्कुरा रहे हों।
आंधी तूफान के आने पर हिलती डुलती शाखाएं ,तरह – तरह की आकृतियाँ बनाकर बालमन को कुछ समय के लिए भयभीत भी कर जाती थीं।
सेमल के लाल रंग के फूल मखमली कार्पेट के सामान लॉन में बिछे दिखते थे। उनके फलों से निकलने वाली रुई ,बिलकुल सफ़ेद और मुलायम हुआ करती थी।
जामुन के पेड़ की अपनी खासियत थी। शाखाएं कमजोर होने के कारण ,तेज हवा चलने पर टूट कर गिरी नजर आती थीं। जामुन के फलों की उपयोगिता ,स्वास्थ को बेहतर रखने में उसके योगदान के बारे में बचपन से ही सुनते आयें हैं। फलों की मिठास के साथ बैगनी होती हुई जीभ को शीशे में निहार कर खुश होना और कपड़ों पर लगे हुए जामुन के दागों से दुखी होना ,ये सब उस बगीचे की धमाचौकड़ी का हिस्सा था।
बेर के पेड़ के काँटों के बीच से खट्टी मीठी बेरों को चुनना ,उसे अपनी फ्रॉक के घेरे के बनाये हुए थैले में सँभाल कर रखना।
माँ से मिली हुई हिदायतें भी खट्टे मीठे बेर के फलों को देखकर, रफूचक्कर हो जाया करती थीं।रात में नींद के दौरान आने वाली खांसी माँ की नींद जरूर खराब करती थी। एकबार फिर से नींद में ही,आने वाले कल से बेर न खाने की सख्त हिदायत मिल जाती थी।
अमरूद का वो पेड़ बहुत खास था। ऊंचाई में थोड़ा छोटा होने के कारण बच्चों का पसंदीदा पेड़ था। बारहमासी इलाहाबादी सफेदा अमरुद का पेड़ हमेशा खुश और हरा भरा नजर आता था। आज भी जब भी अमरुद खाती हूं तब, वो अमरुद का पेड़ हमेशा याद आता है।
ज़रा सा पसरा हुआ सा पेड़ था वो। सीधा खड़ा होने की जगह उसका मुख्य तना, कुछ दूरी तक जमीन के समनान्तर आगे बढ़ता था। उसकी यह बनावट बच्चों को आसानी से पेड़ पर चढ़ने के लिए प्रेरित करती थी।
शाखा पर पाँव फँसाकर उलटे लटके हुए बच्चों की आँखें ,रसीले फल की लालच में पेड़ पर बैठे हुए तोतों के झुंड से चार भी हो जाया करती थी।
सर्दी की गुनगुनी धूप में कितनी दुपहरी उस पेड़ के ऊपर कॉपी किताब के साथ भी गुजरी है।
अमरुद के फल रोज के आहार का हिस्सा होते थे।
जैसे -जैसे लोगों का आर्थिक स्तर सुधर रहा है ,वैसे -वैसे देशी फलों की जगह विदेशी फलों ने उनकी फ्रूट बास्केट में जगह घेरनी शुरू कर दी है। ठीक वैसे ही जैसे हरी सब्जी और दालों की जगह पनीर ने अपनी जगह बना ली है ,यही मुख्य कारण है भारत में लोगों के अंदर एनीमिया बढ़ने का।
अमरुद के फायदे अनेक नुकसान कम से कम होते हैं।