ऋतु वसंत की उल्लास लेकर आती है। वसंत ऋतु में ही हमारे देश के कई शहर मेला की सजावट के कारण आकर्षक ढंग से सजते हैं।
मौसम खुशनुमा होने के कारण जनसैलाब भी मेला परिसर में इकट्ठे हुए दिखते हैं।
दिल्ली में रहने वालों को तो आसपास के NCR के शहर भी अपने ही लगते हैं,अब चाहे वो दिल्ली से सटे उ०प्र० के शहर हों या हरियाणा के।
हरियाणा का फरीदाबाद शहर विगत तीन दशक से ज्यादा समय से ,हरियाणा सरकार के सहयोग से सूरजकुंड मेले का आयोजन करता रहा है।
मै भी अपने उत्साह को नही रोक पायी और सूरजकुंड मेले में शिरकत करने पहुंच गयी।
हर बार अलग प्रदेश की थीम के अनुरूप मेले का आयोजन होता है।
इस बार उत्तर प्रदेश की कल्पना को मेले में उतारा गया था, और उसी के अनुरूप मेला परिसर सजाया गया था।
एक तरफ हरियाणा की भूमि अपने को दमदार तरीके से प्रस्तुत करते हुए बोल रही थी।
“देशों में देश हरियाणा
जित है दूध दही का खाणा”
तो दूसरी तरफ सारा मेला परिसर बोलता हुआ दिख रहा था।
“यू०पी० नही देखा तो इंडिया नही देखा”
कुल मिलाकर एक प्रदेश अपनी भूमि पर दूसरे प्रदेश के साथ स्नेह प्रर्दशित करते हुए ,भाईचारा निभा रहा था।
मुख्य द्वार का नाम ब्रजद्वार रखा गया था ,और कान्हा जी द्वार के ऊपर विराजकर आने जाने वाले लोगों को निहार रहे थे।
सूरजकुंड मेले का आयोजन कराने का मुख्य उद्देश्य हरियाणा सरकार का, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खरीददारों के लिए, पहुंच प्राप्त कराने में शिल्पकारों की मदद करना है।
मेला परिसर में प्रवेश करते ही बच्चों के शोर ने नज़रों को फेर दिया। एक अलग ही खंड हर उम्र के बच्चों को ध्यान में रखकर झूलों से सजाया हुआ था।
मेले की सजावट को रंग-बिरंगे उल्टे छाते, रंगीन झालरें, कलात्मक तरीके से बनाते हुए द्वार
निखार रहे थे।
ज़रा सा आगे बढ़ते ही बनारस के घाटों का आकर्षक क्रम, सजा हुआ दिखाई दे गया।
भगवान विश्वनाथ की नगरी वाराणसी “देशों में देश हरियाणा”की जमीं पर उतरी हुई दिख रही थी। थोड़ी दूर पर ही भगवान राम की भी ओजमयी मूर्त्ति दिख गई।
वाराणसी के घाटों की श्रृंखला समाप्त होते ही, महाराष्ट्र की एलीफेंटा केव को दिखाते हुए भगवान शिव की त्रिमूर्ति दिखती है,जो शाम ढलने के बाद अलग-अलग रंग की रोशनी में डूब कर ज्यादा आकर्षित कर रही थी।

दुधवा नेशनल पार्क को दिखाता हुआ एक बाघ भीड़ की तरफ देखता हुआ दिखता है ,वहीं गैंडा अपनी आंखों को चैतन्यता से खोले नज़र आता है। हस्तशिल्प और शिल्पकारों के साथ यह मेला , पर्यावरण सुरक्षा और उसके महत्व की बात भी कर रहा था।
इस बार भी गड़िया लोहारों की बैलगाड़ी और उनका परिधान लोगों को आकर्षित कर रहा था।
अचानक से हरियाणा का गांव भी दिख गया बड़ी सी खाट उसके सामने रखा हुआ हुक्का। हुक्के के माध्यम से सामाजिक लोकाचार को, चौपाल और घरों के आंगन के जरिए दिखाने का प्रयास, खूबसूरती से किया गया था।

हर उम्र के बच्चे दिखाई पड़ रहे थे,कुछ तो अपनी मां की गोद में घूमते घूमते ही थकान महसूस करते हुए सो गए,तो कोई पैदल चलने के बाद अपने परिवार के सदस्यों की गोद में निढाल हो गया। मेले की मस्ती बच्चों की खिलखिलाहट और उत्साह के बगैर अधूरी दिखती है।
एक बच्चे के हाथ से छूटा हुआ सिक्का भी अपनी मस्ती में ढलान पर लुढ़कते हुए गति पकड़ लिया,उस सिक्के को पकड़ने की कोशिश में बच्चों का झुंड दिखा।
आगे बढ़ते ही बीन पर थिरकते हुए पांव भी दिख गए,ढोल की थाप ने विदेशियों को भी ताल के साथ थिरकने के लिए उत्साहित कर दिया।
कानों ने अस्सी के दशक के गाने को सुनने के बाद कदमों को रोक दिया, रंगीन साफा बांधे हुए बाइस्कोप वाले को देखकर बचपन के दिन याद आ गये, लोगों का समूह बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।






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बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख, वो भी सहज शब्दो में।
बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है इस मेले को आपके सटीक शब्दों के द्वारा।
धन्यवाद 😊