
हर किसी का होता है, अपना ‘आशियाना’
किसी ने खून पसीने की कमाई से, ईंटों को जोड़ा होता है
किसी के पास होता है,पुश्तैनी खजाने के साथ ‘आशियाना’ ।
हमेशा से आशियानों मे लगे दरवाजे, कभी शांत,कभी मस्ती मे झूलते
कभी फालतू मे बोलते दिखते हैं ।
दरवाजा,किवाड़,फाटक,दर,द्वार जैसे शब्दों के साथ
दरवाजे,अपनी तरफ आकर्षित करते दिखे ।
कहीं ऐतिहासिक इमारतों मे इतने ऊंचे दिखे कि
सिर को ऊपर उठा कर देखने पर मजबूर किये ।
कई धार्मिक स्थलों पर शायद !जानबूझ कर इतने नीचे बने कि
सिर को नीचे झुका कर,परिसर मे प्रवेश को उत्सुक दिखे ।
धार्मिक स्थलों के द्वारों पर मस्तक झुकते ही
अहम् दर से टकरा जाता है ।
श्रद्धा और आस्था के भाव से
मन आलोकित हो जाता है ।
घरों के दरवाजे हों या किलों,बाजारों,दुकानों
या ऐतिहासिक इमारतों के
वास्तु के साथ-साथ खुद से जुड़ी हुई
तमाम बातें कह जाते हैं ।

एक दरवाजा,कितने रहस्यों को छुपाया होता है ।
कितने तरह के तालों को, अपने ऊपर लटकाया होता है ।
सामान्यतौर पर दरवाजे,घर के मान और सम्मान की पहचान बने ।
सम्मान के साथ खुलने पर,अतिथियों के लिए स्वागत के द्वार बने ।
अरब सागर भी अपने तट पर, एक द्वार लिए डोलता है ।

नाम पूछने पर,भारत का प्रवेश द्वार
“गेटवे आफ इंडिया”बोलता है ।
युद्ध स्मारक के नाम पर भी दरवाजा
नज़र आता है
राजपथ पर “इंडिया गेट”के नाम से

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