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अहिंसा धर्म की प्रशंसा और कथा ‘चिरकारी’ की

by 2974shikhat December 28, 2020
by 2974shikhat December 28, 2020

महाभारत की कथा अनुसार…..

मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह युधिष्ठिर के सवालों का जवाब देते जा रहे थे।
युधिष्ठिर ने पूछा पितामह ! यदि कभी गुरु की द्वारा किसी कठोर कार्य को करने का आदेश दिया जाये तो क्या करना चाहिए ? उस काम को करने में शीघ्रता करनी चाहिए , या विलम्ब करके उसके परिणाम के बारे में पहले सोचना चाहिए।
भीष्म पितामह ने कहा प्राचीन इतिहास है कि, महर्षि गौतम के चिरकारी नाम का एक पुत्र था। जो बहुत बुद्धिमान था लेकिन देर तक जगता और देर तक सोता था। किसी भी कार्य पर बहुत देर तक विचार करता था। हमेशा काम को देर से पूरा करता था। इसी कारण उसका नाम चिरकारी पड़ा। सामान्यतौर पर लोग उसे मंदबुद्धि आलसी और नासमझ समझते थे।
एक दिन महर्षि गौतम ने अपनी पत्नी का व्यभिचार देखकर अत्यधिक क्रोध किया। अपने पुत्र को पत्नी का वध करने का आदेश देकर वन में चले गए।
बिना सोचे विचारे अपने अन्य पुत्रों को माँ का वध करने का आदेश न देकर, उन्होंने चिरकारिक को ही यह कार्य करने का आदेश दिया।
चिरकारिक अपने स्वभाव के अनुसार विचार करने लगा। उसने सोचा क्या उपाय करूं जिससे, पिता की आज्ञा का पालन भी हो जाये और माँ का वध भी न हो।
धर्म के बहाने यह मुझपर गंभीर संकट आ पड़। पिता की आज्ञा का पालन करना धर्म है तो, माँ की रक्षा करना भी मेरा ही धर्म है ।
पिता ही धर्म है ,पिता ही स्वर्ग है,पिता ही सबसे बड़ा तप है।
पिता के बारे में तो सोच लिया, अब माँ के बारे में सोचता हूँ।
मुझे जो पंचतत्वों से बना शरीर मिला है, इसको जन्म देने वाली मेरी माँ ही है। जब तक माँ जिन्दा है व्यक्ति सनाथ है नहीं तो अनाथ है।
माँ की छत्र छाया में जो सुख है वो, और कहीं नहीं है।
पिता की तुलना में माँ का, संतान से विशेष स्नेह होता है।
पुरुष अपनी पत्नी का भरण पोषण करने से, भर्ता और पालन करने से पति कहलाता है।
इसलिए माँ को मारने का आदेश देकर, मेरे पिता अपने कर्तव्य से गिर गए हैं।
कपटी इंद्र ने माँ को छला। इसमें माँ का अंशमात्र भी दोष नहीं है। माँ का गौरव पिता से भी बढ़कर है।
एक तो नारी होने के कारण अवध्य है, दूसरी वह मेरी माँ है।
मै समझदार होकर भी, नासमझ जैसा व्यहवार क्यों करूँ ।
विलम्ब करने के स्वभाव के कारण ही वो, देर तक सोचता विचारता रहा।इतने में ऋषि वन से वापस आ गए।
वो शोक के आंसू बहा रहे थे , पश्चाताप और आत्म ग्लानि की अग्नि में जल रहे थे।

ओह ! वो कपटी त्रिभुवन का स्वामी इंद्र, ब्राह्मण का वेश धरकर मेरे घर आया। मैंने ही उसका स्वागत और विधिवत पूजन कर अपने घर में आश्रय दिया। उसने अपनी विषय लोलुपता के कारण ऐसा काम किया। ईर्ष्या के कारण मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी।
मैंने तो अपनी पत्नी की हत्या कर डाली , अब कौन मुझे इस पाप से मुक्त करेगा।
मैंने चिरकारी को उसकी माँ का वध करने का आदेश दिया था। यदि उसने अपनी बुद्धि के अनुसार काम में विलम्ब किया हो तो , वही मुझे स्त्रीहत्या के दोष से बचा सकता है।
बेटा चिरकारिक यदि तूने आज इस काम में देरी की हो तो, अपने नाम को सफल बना सकता है।
इसप्रकार विचार करते हुए ऋषि गौतम आश्रम में आये , उन्हें देखकर चिरकारी हथियार फेंककर अपने पिता के चरणों में गिर पड़ा।
अपने पुत्र को चरणों में गिरा देखकर , और पत्नी को सामने देखकर ऋषि प्रसन्न हो गए।
अपने पुत्र को गले लगा कर बोले, प्रत्येक कार्य में देर तक सोच विचार कर, किसी निश्चय पर पहुंचने वाले को पश्चाताप नहीं करना पड़ता। तूने आज मुझे बहुत बड़े पाप से बचा लिया।
चिरंजीवी रह पुत्र…..

consciousnessMahabharat
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2974shikhat

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