जनवरी का महीना और बात अपने ही शहर की…..
हवा में ठंडक ,गर्म कपड़ों की बाजार में सजावट ,शरीर पर जैकेट टोपी और स्कार्फ़ का पहनावा बिना बोले ही यह कह देते हैं , ज़नाब ! जनवरी का महीना चल रहा है। बात दिल्ली शहर की करें तो आधा से ज्यादा दिसंबर अच्छी ठंड के इंतज़ार में ही चला जाता है।
अब वैसे भी ग्लोबल वार्मिंग कह लीजिये या और कोई कारण समझ लीजिये ,मौसम भी मौसम में बदला -बदला सा रहता है।
हमारे दिल्ली शहर में गर्मी तो ऐसी पड़ती है कि, लगता है लोहा न पिघल जाये। साल के बारह महीनों में से ८,९ महीने तो एयर कंडीशनर की ठंडक के कारण बिजली के बिल पसीना छुड़ाते रहते हैं। दिसंबर की सर्दी शुरुआती और बीच के महीने में उतनी कड़क अब नही रहती। धूप की खोज में लोग अपने परिवार के साथ पार्क की सैर करते नज़र आ जाते हैं ,हल्का फुल्का सा माहौल दिखता है।
लालबत्ती होते ही चौराहों पर सामान बेचने वाले लोग, डिवाइडर के बीच से निकलकर गाड़ी के सामने आ जाते हैं। मार्केटिंग स्ट्रैट्जी इन चौराहों पर भी नज़र आती है। दिसंबर के महीने के कुछ दिन बीतते ही सांता टोपी ,क्रिसमस के सजावटी सामान बेचते इन चौराहों पर हर उम्र के लोग नज़र आ जायेंगे । नया साल के उत्साह के कम होते ही, रिपब्लिक डे की चहल पहल शुरू हो जाती है। रात दिन हर जगह तिरंगे की छटा बिखरी दिखती है।
सोसाइटी के ड्राइव वे और पार्क की तुलना में ,पब्लिक पार्क चहल पहल से भरे हुए दिखाई देते हैं। उत्साही देल्हीवासी “एक पंथ दो काज” पर ज्यादा विश्वास करते हैं। पब्लिक पार्क पिकनिक मनाने की अच्छी जगह होने के साथ , एक्सरसाइज करने और मनोरंजन की खुली सी जगह उपलब्ध कराते हैं। चाणक्य पुरी में स्थित नेहरू पार्क , लोदी गार्डन और सुन्दर नर्सरी में लोग अलग -अलग गतिविधि में शामिल दिख जाते हैं।
लोकल पार्क भी सोसाइटी के पार्क की तुलना में बड़े होते हैं। यदि इनमें साफ़ सफाई है ,हरियाली बरक़रार है तो आस-पास के रहने वाले लोगों के लिए बात “सोने पर सुहागा” वाली हो जाती है।
सर्दी की छुट्टियाँ शुरू होने के ठीक पहले ,स्कूल्स में विंटर कार्निवल का समय आ जाता है। पार्क की सैर करते समय ,तले भुने खाने के साथ चाइनीज़ खाने की खुशबू भी भीतर समा गयी।
पार्क की बेहतर क़्वालिटी वाली हवा के साथ ,खाने की खुशबू नाक में समाते ही समझ में आया, पार्क की चाहरदीवारी के बाहर स्कूल में विंटर कार्निवल का मेला चल रहा था। कोलंबस और जॉइंट व्हील पर तेजी से झूला झूलते हुए बच्चों का शोर भी हवा में शामिल था।
पिछले कुछ सालों में रिलीज़ हुई पिक्चर के पॉपुलर आइटम सांग ,डीजे पर बजने की आवाज कान में सुनाई पड़ रही थी। चेहरे पर मुस्कान आ गयी ,अपना समय याद आ गया पहले स्कूल के फंक्शन्स में फिल्मी गाने प्रतिबंधित रहते थे।
अब समय बदल गया है ,स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों में बच्चों का फिल्मी गानों पर थिरकना आम बात है। इस तरह की बातों पर डिस्कसन करना खुद को बैकवर्ड श्रेणी में खड़ा करना होता है। मनोरंजन और आयोजनों को सफल बनाना पहली प्राथमिकता होती है।
चिड़ियों की तरह -तरह की आवाज और गिलहरियों की भागादौड़ी के बीच में, मेरी नजरें किसी को खोज रहीं थी। रोज की सैर में बड़ी दूर से फुटपाथ पर हिलता – डुलता चार पांच महीने का नन्हा सा बच्चा नजर आ जाता था। बच्चे की माँ थोड़ी दूर पर ही घांस छीलती या पौधों की गुड़ाई करती रहती। बच्चा पेट के बल लेटकर अपनी माँ की आहट लेने की कोशिश करता दिखता था।
सोचने लगी मै भारत जैसे विकासशील देश में यह सामान्य सी ही तो बात है ,जाने कितने दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर गरीबी के कारण अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर ऐसे ही काम करते हैं। स्कूल की प्राइमरी एजुकेशन पाना उनके लिए असंभव होता है ,विंटर कार्निवल जैसे आयोजनों में शामिल होना तो बहुत दूर की बात है।
रुक कर बात करने की मेरी आदत ने मुझे उस महिला के बच्चे की कुशल क्षेम पूछने कीआदत डाल दी थी। मन थोड़ा खाली सा हो गया काफी दूर तक देखने पर भी वह नजर नही आयी, तब याद आया उसने कहा था “मैडम जी हमलोग दिहाड़ी पर काम करते हैं ,आज यहाँ कल कहीं और। सुबह नौ से शाम के पांच बजे तक काम करती हूँ तब तक, बच्चे को ऐसे ही कथरी में जमीन पर लिटा देती हूँ।”
कुछ दिनों बाद दूसरे पार्क में टहलते हुए दूर से ही मुझे , चिर – परिचित सा चेहरा नज़र आ गया मन खुश हो गया। वही महिला थी बच्चा पास में कहीं दिख नहीं रहा था। अपनी आदत से मजबूर मैंने उससे पूछ ही लिया ,आज इस पार्क में कैसे ? मै तो तुम्हें तुम्हारी पुरानी जगह पर खोज रही थी। हँसकर बोल गयी “मैडम जी मेहनत मजूरी करने वाले इंसान है,जहाँ काम मिलता है वहीं काम करते हैं। मुस्कुराते हुए बोली बच्चा उधर पेड़ों की छाँव में सो रहा है।
मैंने मुड़ कर बच्चे को देखा सांवला सा गोल मटोल चेहरा,माथे पर सामान्य से थोड़ा बड़ा काला टीका ,हाथ पाँव पर बधे हुए काले धागों के ऊपर नकारात्मक शक्ति से बचाने की पूरी जिम्मेदारी थी। बच्चा सर्द दोपहर में आराम से सो रहा था।
मैंने अपने क़दमों को आगे बढ़ा लिया सोचने लगी ,उस नन्हे से बच्चे का भविष्य क्या होगा ? अनपढ़ों की भीड़ का हिस्सा तो नही बनेगा ? प्राइमरी एजुकेशन मिलेगी की नही ? कुछ समय के लिए ही सही ,सवालों के भंवर में फँस गयी।