विदेशी यात्री और उपहार
एक खूबसूरत सी सुबह सूरत के बंदरगाह में साधारण जहाजों से कुछ बड़ा एक जहाज आकर रुका।
इस जहाज को देखकर लग रहा था की बड़े -बड़े दरियाओं को पार करके हिंदुस्तान आया है। ज्यादातर ऐसे जहाजों की सूरत में मरम्मत होती है।
रंगाई -पुताई और सफाई होती है। कुछ दिन या कुछ महीनों के बाद ये जहाज फिर से ,समुद्र की लहरों के बीच यात्रा करने वापस हो लेते हैं।

मरम्मत से पहले जहाज को खाली कराया जाता है। छोटी – छोटी नावों पर जहाज का सामान उतारकर समुद्र तट पर लाया जाता है।
ज्यों -ज्यों दिन चढ़ने लगा ,लोगों ने देखा जहाज से उतरने के लिए लोग व्याकुल हो रहे हैं। दूर से देखकर लगा उस जहाज पर विदेशियों के साथ कुछ हब्शी गुलाम भी हैं ,जो काफी लम्बे तगड़े हैं।
दोपहर तक भीड़ काफी छँट गयी ,तब जहाज का नाम पढ़ा जा सका। सूरत के बंदरगाह के मुंशी पढ़कर यह न समझ सके की , किस फिरंगी देश से यह जहाज आया है। शाम को उस जहाज से एक बड़ी नाव लेकर एक आदमी किनारे पर आकर उतरा। उस आदमी को देखकर बंदरगाह के खलासी से लेकर मुंशी तक एक साथ चौंक पड़े।
अरे ! ये तो टेवरनियर साहब हैं।
मुंशी की बात सुनकर टेवरनियर जरा झुककर फिर सीधे खड़े हो गये। हँसकर बोले बहुत दिनों बाद आया हूँ न ?
मुंशी बोले ज्यादा दिन कहाँ ? अभी -अभी २ साल भी तो नहीं हुए हैं आपअपने देश वापस लौट गए थे।
सभी लोग बातें करने में मशगूल थे तभी अचानक , बंदरगाह पर हल्ला मच गया ।
बजरे जैसी बड़ी सी नाव से लम्बे – लम्बे डग भरते हुये तीन जिराफ किनारे पर उतरे।
उनको नीचे उतारते ही ,उनको लाने वाली नाव बड़ी जोर -जोर से हिलने लगी ऐसा लगा अभी पलट जाएगी।
उनमे से एक जिराफ ने पलक झपकते ही मुंशी के सिर का साफा , मुँह आगे बढ़ाकर उठा लिया और मुँह में रखकर शांत भाव के साथ चबाने लगा। मुंशी अपनी कुर्सी पर से उछलकर खड़ा हो गया ” ये जिराफ कहाँ जायेंगे ? “
टेवरनियर के लिये सूरत का बंदरगाह अब बिल्कुल भी अपरिचित नही था। लेकिन हिंदुस्तान आज भी उनके लिये उतना ही विस्मयकारी है जैसा पहली बार बामन भट्ट के साथ घूमने के दौरान था।
फिर भी वे हिंदुस्तान के कायदे – कानून ,कोतवाल ,फौजदार जैसी बातों के जानकार हो गये हैं। इस समय यीशू के जन्म के समय के बाद का सोलह सौ अड़तीसवाँ साल चल रहा है।
बंदरगाह के मुंशी के कहने पर , टेवरनियर ने अपने सुनहरे बालों में लगे हुए लाल रंग के रिबन को खोल दिया। उस लाल रिबन से उन्होंने जेब से निकाली उलन्दाज़ घड़ी को लटकाया और हँसते हुए मुंशी को पहना दिया।
मुंशी मिर्ज़ापुर के कायस्थ हैं। छोटा कद है ,गाल में दबा पान और माथे पर टीका।
मुंशी को लगा उसके सामने तीन नही चार जिराफ खड़े हैं।
क्योंकि टेवरनियर भी काफी लम्बे थे। उनके चेहरे को देखने के लिये गर्दन को काफी ऊपर उठाना पड़ता था।
घड़ी की सुइयों पर सोने का पानी चढ़ा था। मुंशी घड़ी को देखकर मंद- मंद मुस्कुराये।
टेवरनियर ने हाथ ऊँचा करके जिराफ के मुँह से मुंशी की पगड़ी को छुड़ा करके वापस कर दिया।
दोनों हाथ से अपने कमर को छूकर अंदाजा लगा लिया की साथ में लाये हुए हीरे जवाहरात सही सलामत हैं की नही।
अपने तीनों जिराफ को साथ में लेकर शहर की तरफ , सराय की तलाश में चल पड़े।