जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे,प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ।।
हे वरदायिनी देवि ! हे भगवति ! तुम्हारी जय हो ।
हे पाप को हरने वाली देवि !तुम्हारी जय हो! हे शुम्भ निशुम्भ के मुण्डों को धारण करने वाली देवि तुम्हारी जय हो । हे मनुष्यों की पीड़ा को हरने वाली देवि !मै तुम्हें प्रणाम करती हूँ।
शरद ऋतु का आगमन अपने आप मे ही, संचित ऊर्जा का खजाना होता है।
मनुष्य उत्साह और सकारत्मकता को सारे ब्रम्हाण्ड मे महसूस कर सकता है।
शरद काल मे देवी की नि:स्वार्थ और सकारात्मक भाव के साथ उपासना, सर्वबाधा से मुक्त करने की क्षमता रखती है । ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के समय,स्वच्छ मन से की जाने वाली उपासना शक्ति,संपन्नता,ऐश्वर्य और पुण्य देने वाली होती है।
चारों वेद भी शक्ति की प्रशंसा करते हैं ।
धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने रावण पर विजय पाने के लिए, देवी दुर्गा का आह्वान किया था।
श्रीकृष्ण के आदेश पर महाभारत मे जीत हासिल करने के लिये पांडवों ने,देवी दुर्गा की पूजा उपासना की।
श्रीकृष्ण का वरण करने के लिए, गोपियों ने देवी दुर्गा से मदद मांगी ।
माँ का प्रेम नि:स्वार्थ है जो,सभी प्राणियों के लिए समान होता है।
माँ के सुरक्षात्मक कवच मे जीव, निर्भयता के साथ,जीवन का आनंद लेता है।
वास्तव मे शरदीय नवरात्र मे महाशक्ति ,साधकों के हृदय मे स्वयं वास करने का सार्मथ्य रखती हैं,और अपने नौ रूपों के अनुसार साधक को गुणों से संपन्न करती हैं। शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक के नौ स्वरूप,जीवनपथ पर आगे बढ़ने के लिये रास्ता दिखाते हैं।
सफल और स्वस्थ जीवन के लिये….. धैर्य की अनिवार्यता, अच्छा आचरण, आत्मविश्वास के साथ विनम्रता,रचनात्मकता का जीवन पर प्रभाव,प्रेम की आवश्यकता, वीरता का धर्म,निर्भय जीवन,सत्य की शक्ति,उदार व्यक्तित्व …
ये नौ गुण देवी के अलग अलग रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं,और निश्चित रूप से इंसानियत और मानवता के पथ पर आगे बढ़ने के लिए, शक्तिदात्री माँ के आर्शिवाद रूप मे, साधक के साथ जीवन पर्यंत चलते हैं।
माँ की उपासना करते हुए कभी कभी साधक, इतना भाविह्वल हो जाता है कि अपने भावों को माँ को सर्मपित करते हुए बोल पड़ता है…
न तातो न माता न बन्धुर्न न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।।
हे भवानि! माता पिता,भाई, दाता,पुत्र पुत्री, भृत्य ,स्वामी,स्त्री,विद्या और वृत्ति इनमे से कोई भी मेरा अपना नही है।
एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो…तुम्हीं मेरी गति हो…….तुम्हीं मेरी गति हो………
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