क्या आप के भीतर इस बात का दंभ है कि आप देश की राजधानी के वासी हैं ?
क्यों न हो आखिर गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ पर निकलने वाली झांकियाँ और परेड गर्वान्वित महसूस कराती है। देश भक्ति का भाव प्रबल हो जाता है। यूनिफॉर्म के साथ होने वाली कदमताल ,आकाश में तीव्र गति से होने वाला एयर शो। साफ़ सुथरे रास्तों पर ,फूलों की बिखरती हुई पंखुड़ियाँ स्वर्ग सी अनुभूति करा देते हैं।
देश की राजधानी में किसी भी तरह का आयोजन हो रहा हो तो सुरक्षा चाक चौबंद ,रास्ते साफ़ सुथरे दिखेंगे ,काली सफ़ेद जेब्रा क्रासिंग दूर से ही चमकती दिखेगी ,यातायात सुव्यवस्थित रहेगा।
किसी छुट्टी वाले दिन अगर घूमने फिरने निकलो तो कार की छत की ऊपर से ,बहुत पास से जाता हुआ एयर क्राफ्ट बताता है कि आप एयरपोर्ट के पास से गुजर रहे हैं । तभी जगमगाती हुई एयरपोर्ट एक्सप्रेस मेट्रो भी तीव्र गति से भागती हुई नज़र आ जायेगी।
इतनी व्यवस्थित और सुन्दर राजधानी के दर्शन करने के बाद, आइये रोजमर्रा के जीवन पर चलते हैं और तस्वीर का दूसरा रूप भी देखते हैं।
जीवन को बेहतर तरीके से जीने की शिक्षा देने वाला वर्ग हो या चिकित्सक हो ,रोज के जीवन में वॉक ,मेडिटेशन और एक्सरसाइज को सबसे पहले स्थान देने की बात कहता है।
ऐसा नहीं है की हमारे शहर में हरियाली से भरे हुए पार्क नही हैं।
मुश्किल यह है कि पार्क को जोड़ने वाले रास्ते खस्ताहाल हैं।
घर से बाहर निकलिये फुटपाथ पर चलते हुए अपनी आँखों को सतर्क रखिये ,पूरी सम्भावना है कि आप को अपनी नाक को रुमाल से ढांकना पड़ेगा । सड़क के किनारे कचड़े से भरे हुए डब्बे मन को खराब कर देते हैं।
फुटपाथ के डगमगाते हुए स्लैब कब आपको नाले के भीतर के भीतर गिरा दें, पता भी नहीं चलेगा। सरकार किसी भी पार्टी की हो लुटियंस की दिल्ली के अलावा पश्चिमी ,पूर्वी ,उत्तरी ,दक्षिणी दिल्ली के कुछ इलाकों की समस्या एक जैसी ही है।
रही सही कसर कुत्ते पालने वाले लोगों के द्वारा पूरी की जाती है। पैदल चलने वालों के लिए बनाये गए फुटपाथ को कुत्तों का टॉयलेट बना दिया जाता है। अगर आप उनके द्वारा गंदगी फ़ैलाने का विरोध करते हो तो, आप जीव प्रेमी की श्रेणी में नही आते।
आधा से ज्यादा फुटपाथ या तो गाड़ियों की पार्किंग के लिए उपयोग मे लाया जाता है या, स्ट्रीट फ़ूड का स्टाल लगाने वाले वेंडर के अधीन रहता है। फुटपाथ पर चलने वाला व्यक्ति इन दोनो कृत्यों मे अवरोध पैदा करता है। सबसे दिलचस्प बात तो यह होती है कि, ये सारे काम प्रशासन की देखरेख मे होते हैं।
यातायात व्यवस्था की बात करें तो जेब्रा क्रासिंग बेमाने होती है।
सबसे पहले राजधानी की बसें ही इनको पार करके खड़ी मिलेंगी ,उनके अगल बगल या आगे पतंगों की तरह उड़ते हुए दुपहिया वाहन चालक दिखेंगे। रास्ता पार करने के लिए जेब्रा क्रासिंग को खोजते रह जाओगे ,व्यंग मिश्रित मुस्कान से वाहन चालकों के चेहरे को दमकते हुए पाओगे।
क्या हमारे देश मे सार्वजनिक स्थल की साफसफाई ,सुव्यवस्थित यातायात ,आम आदमी की सुरक्षा सबसे जरूरी मुद्दा बनेगा ?
केवल मुद्दा ही नही कभी अमलीजामा भी पहनाया जायेगा?
आजकल राजधानी मे चुनावी माहौल है। फ़ोन पर अनचाही कॉल्स की संख्या बढ़ गयी है। रास्तों पर लाऊड स्पीकर मे तेज आवाज मे चुनाव के प्रतिद्वंदियों का प्रचार प्रसार शुरू हो गया है।
हर चुनाव के समय आम आदमी इसी आशा मे रहता है कि,शायद पहले से कुछ बेहतर हो,लेकिन हर बार स्थित्ति वही “ढाक के तीन पात“ वाली रहती है। अभी भी देश की राजधानी के लिए मिले जुले से विचार आ रहे हैं। क्या हमको गर्वान्वित होना चाहिए या ,आम जनता की समस्याओं के समाधान की तरफ ध्यान आकर्षित करने का सतत प्रयास करना चाहिये।