(February 13,2025)
“माँ अब नही रहीं ” यह सुनना दुःख देने वाला है ,लेकिन वास्तविकता का ही एक और चेहरा है।
इस रचना मे समाये हुए भाव और शब्दों से उन पाठकों का एक बड़ा समूह अपने को जोड़ पायेगा जिन्होंने अपनी माँ को खो दिया है।
माँ के न रहने पर घर जाना हुआ…
ऐसा लगा मानो , होश सँभालने से लेकर अब तक
माँ के साथ बिताये हुए हर पल को मन ने छुआ…
मुख्य दरवाजे के पास , टकटकी लगाकर निहारती हुई नज़र न दिखी..
कुछ समय के अंतराल पर बजने वाली मोबाइल की घंटी…
न जाने कितने समय से शांत ही रही…
मन को मुग्ध करने वाला ,निश्छल चेहरा कहीं न दिखा…
बेटी ! सफर सभ्य लोगों के बीच मे ही कटा ?
यह सवाल किसी और ने न पूछा…
पहले कुछ मीठा खाओ पानी पियो…
ज्यादा अपनी कहो कुछ मेरी सुनो…
बातों का यह अंदाज कहीं न दिखा…
माँ के कमरे मे ,करीने से सजायी हुई तस्वीरें दिखीं…
तस्वीर मे मै रूठी हुई , माँ मुस्कुराती हुई दिखी…
मन ने कहा ,माँ का श्रृंगारदान निहारते हैं…
पापा के जाने के बाद ,माँ के द्वारा संभाल कर रखे हुए सौभाग्यचिन्हों के साथ…
स्मृतियों की लम्बी सैर पर जाते हैं…
जहाँ संबल है सहारा भी है…
रूठना है मनाना भी है…
अतिथियों के लिए संभाल कर रखे हुए…
बिस्तर के बक्सों की तरफ नज़र फिर गयी…
नेफ्थलीन की गोलियों की महक के साथ…
साफ सुथरे रजाई – गद्दों की झलक दिखी…
रसोई के भीतर माँ का व्यक्तित्व निखर कर सामने आया…
जब से होश संभाला माँ को…
सबकी पेट की क्षुधा शांत करने के लिए…
प्रयासरत ही पाया…
एक अलग सा खालीपन रसोई के भीतर समाया हुआ था…
माँ अब नहीं हैं क्या ?
इस सवाल ने मन को भरमाया हुआ था…
आलमारी के भीतर करीने से टंगी हुई उनकी साड़ियों की तरफ नज़र गयी…
उनके कपड़ों से आती हुई विशेष सी सुगंध मन मे घर कर गयी…
मन माँ से शिकायत करने के लहजे में भूतकाल की तरफ मुड़ा…
आलमारी को क़ायदे से सजाने की कला हमे क्यों नहीं सिखायीं ?
चिरपरिचित सी झिड़क और बातों ही बातों मे…
कुछ नया सिखाने की सुघड़ता सामने आयी…
क्या अब माँ नहीं हैं ?
यह सवाल बार -बार सामने आ रहा था…
समय सत्य के साथ दर्पण मे…
चेहरा दिखा रहा था…