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फुदकती हुई चिरैया
कभी नन्ही सी गौरैया
कभी मैना मतवाली
वहीं कभी फाख्ता की चाल बड़ी प्यारी ।
भोर का समय हो ।
ज़रा सा अलसाया सा
प्रकृति का सौंदर्य हो ।
कबूतरों का तो समझ मे नही आता ठौर ठिकाना ।
कभी बारजों पर ,कभी छज्जों पर
बैठे हुए ही इठलाना ।
कभी आँगन मे आकर,दाना चुगते हुए ही
दिख जाना ।
कभी कभी ध्यान से देखती हूं
बगीचे की मिट्टी को ।
कोमल दूबों या, हरी हरी घाँस के बीच मे
छुपी हुई प्रकृति को ।
समझ मे नही आती, इन चिरैयों की प्रवृत्ति ।
मिट्टी के बीच से क्या चुगती रहती हैं ?
कहीं ऐसा तो नही ये भी
गीली और सूखी मिट्टी के बीच मे
कविता या कहानी, बुनती रहती हैं ।
कभी तो धरा पर,घूमती फिरती दिखती ।
कभी पंखों को फैलाकर, उड़ान भरती दिखती ।
सुबह की सैर पर निकलो तो
पेड़ों, झाड़ियों और तारों पर
चिरपरिचित से पक्षी दिखते हैं ।
भूरे रंग और भूरी काली आँखों वाली
बबलर चिड़िया की आवाज
कानों को सुबह सुबह चुभती है ।
लेकिन! अपने मस्तमौला अंदाज मे
बबलर चिड़िया भी
जाने कौन सा ,गीत संगीत गुनती रहती है ।

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पेड़ों की शाखों से अलग
तार पर बैठा हुआ नीलकंठ पक्षी
नज़र आ रहा था ।
ऐसा लग रहा था मानो
ध्यान की अवस्था मे
उगते हुए भास्कर के प्रति
अपार श्रद्धा और भक्ति दिखा रहा था ।
छोटी -छोटी मुनिया चिड़िया
पत्तियों और झाड़ियों के बीच मे
जाने कहाँ घुम जाती हैं ।
ऐसा लगता है मानो
मानव जगत के, छुपम छुपाई के खेल को
दिल से अपनाती हैं ।
सिर के ऊपर से पक्षियों का झुण्ड
उड़ान भरता नज़र आता ।
अपनी छाया को धरती पर छोड़ता हुआ
दिख जाता ।
उनका बात करने का अंदाज ।
कभी किसी पेड़ पर बैठना ।
कभी किसी पर बैठने का उतावलापन
तोतों के समूह की बात
बतला जाता ।

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