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हमारा देश भी, विकास की नयी ऊंचाइयों को ,छूता हुआ नज़र आ रहा है…
आधुनिक तकनीकि को अपनाकर सहजता से ,कम गलतियों की संभावना के साथ…
अपने काम को, पूरे आत्मविश्वास के साथ करता जा रहा है…
इसी क्रम मे किओस्क मशीन,अपनी तरफ देखने पर मजबूर करती है
सहजता के साथ काम करती हुयी, विज्ञान की सौगात नज़र आती है…
महानगरों मे तो आसानी से व्यापारिक प्रतिष्ठानो,बैंकों,हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशन पर दिख जाती है …
मुझे किओस्क मशीन बड़ी भली सी लगती है…
जब भी किओस्क मशीन को, मोबाइल का बिल भरते समय या, बैंकों मे आराम से खड़े होकर रुपयों को निगलते और उगलते हुये देखती हूँ….
हमेशा ही याद आती है ,भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज मे,उथल पुथल की नोटबंदी की बात…..
थी वो, आठ और नौ नवंबर दो हजार सोलह की रात…..
दूसरे ही दिन से किओस्क मशीन, रुपये निगलने मे तन्मयता के साथ जुट गयी…

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लेकिन दूसरी तरफ किओस्क मशीन ही, रुपये को उगलने की बात से मुकर गयी…
न ही कोई प्राकृतिक आपदा थी,न तो पड़ोसी देश की तरफ से,हमले की कोई बात थी…
हर तरफ अफरा तफरी के साथ,व्यवस्था की बात थी…
सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद थी….
भारतीय अर्थव्यवस्था नयी नोटों के साथ, परिवर्तन की राह पर खड़ी थी ….
भोर की किरणों के छिटकते ही, घरों से रेला सा निकल पड़ता था….
बैंकों के परिसरों के बाहर, मेला सा लगा नज़र आता था….
भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मे, बैंकों के काम संपन्न हो रहे थे…
याद हैं वो मुश्किल दिन जो आज, इतिहास के पन्नों मे शामिल हो गये …
पर्यटन उद्योग की तरफ से ,लोगों का मोहभंग हो रहा था…
न कोई तीर्थ यात्रा पर जा रहा था ,न मौजमस्ती के लिये पर्यटन को अपना रहा था…
सबसे महत्वपूर्ण यात्रा ! सिर्फ और सिर्फ बैंकों की ही समझ मे आ रही थी…

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सामान्यतौर पर, भारतीय परिवारों की जिंदगी, बैंकों के दायरे मे सिमटती हुई नज़र आ रही थी….
बड़ी मुश्किलों और मुसीबतों के बाद नये नोट नज़र आ रहे थे…
2000 की सिर्फ दो नई नोट लेकर, बड़े से बड़े सूरमा भी खुश नज़र आ रहे थे….
इससे ज्यादा की फरियाद किसी की स्वीकार्य नही थी….
मुश्किलों मे, शुभकार्यों को संपन्न कराने की तैयारियों मे जुटे
परिवारों की राह थी….
हमने भी कई दिन, बैंकों मे लगने वाली कतारों के नाम किये…..
इसी बहाने अपने संघर्षपूर्ण प्रयास के अनुभवों को
अनेक रचनाओं के नाम किये….
इत्मिनान के साथ अब जाकर नये नोट को देख कर,कुछ लिखने का ख्याल दिमाग मे समाया…
क्योंकि उसी समय, कुछ महीनों के बाद ही …
किओस्क मशीन ने, ज़रा सी मुड़ी हुयी नोट के अलावा…
कुछ नई नोटों को स्वीकारने मे नाक और भौहों को चढ़ाया….
ज़रा सी अकड़ के साथ खड़ी थी….
सिस्टम मे नयी नोट के, अपडेट न होने की बात पर अड़ी थी….
बार बार की मिन्नतों के बाद, ज़रा सी मुड़ी हुयी नोटों को स्वीकार लिया…
अपने देश की करेंसी को सलीके से रखने की सलाह देते हुये, चार बातें हमे सुना दिया …
मैने भी सोचा …सही है इसकी बात…
हमारे देश मे तो कागज की नोट के ऊपर ही, लिखापढ़ी के काम भी हो जाते है…
जाने कितनी तहों मे मुड़ तुड़ के रुपये !
सुरक्षित जगह पर संभाल कर रख दिये जाते हैं…
हमने दो हजार और पांच सौ की नोट को ध्यान से देखा…
दो हजार की नोट के पीछे, मंगलयान के साथ-साथ…

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गांधी जी का चश्मा भी, स्वच्छ भारत अभियान के नारे…
“एक कदम स्वच्छता की ओर”के चिन्ह के साथ नज़र आ गया…
नई नोट पर छपा यह नारा ,बरसात के मौसम मे पूरे भारत की याद दिला गया….
हमारे देश मे वर्षाकाल मे नदी और समुद्र के किनारे बसे हुये शहर, जलभराव की समस्या से जूझते हैं…
स्वच्छ भारत अभियान का नारा नोट पर छपना ,दूर दृष्टि की बात बताता है…
फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था …
अलग अलग रंग की नोट के साथ आगे बढ़ रही है…
भारतीय अर्थव्यवस्था हो या,सामाजिक व्यवस्था…
स्वच्छता के साथ…..
कदम से कदम मिलाकर….
विकास के नये आयाम को, छूने के लिए प्रयत्नशील दिख रही है…..